शिकस्त-ए-दिल को यूं ज़ेवर बना दिया जाए
जो ग़म भी आए तो उनको भुला दिया जाए
सुकूत-ए-शब में तिरे ज़िक्र की महक फैले
चराग़-ए-दिल को अगर फिर जला दिया जाए
गुज़र रहे हैं जो अहल-ए-जुनूँ सर-ए-आलम
उन्हीं को शहर का क़िब्ला बना दिया जाए
वो जिनके लब पे है तस्बीह-ए-सब्र शाम-ओ-सहर
उन्हीं का ज़ख्में ज़िगर फिर बढ़ा दिया जाए
कभी तो वक़्त भी ठहरेगा मेरे पहलू में
किसी घड़ी को अगर दिल बना दिया जाए
वो जिनके हाथ में पत्थर हैं और दिल ख़ाली
उन्हें भी दर्द का मतलब सिखा दिया जाए
जो मेरी ख़ाक से उठता है दर्द का बादल
उसी को अश्क-ए-समंदर बना दिया जाए
कहीं फ़रेब-ए-तमन्ना न लूट ले फिर से
ख़याल-ए-यार को दिल से मिटा दिया जाए
सहर की आस में बैठे हैं कितने अहल-ए-वफ़ा
किसी चराग़ को फिर से जला दिया जाए
Tariq Azeem Tanha