लौट आएगी नयन-तट पर हृदय की वेदना,
सिंधु के तट पर प्रवाही ज्वार जैसे लौट आते।।
फिर वही कुसुमित मृदुल मुस्कान की क्षय की क्रियाएँ,
फिर प्रगल्भा चन्द्रद्युति में अश्रु का व्यापार-विनिमय।
फिर प्रणय का चन्द्र-वीणा-जन्य-विरही-नाद-कौशल,
फिर वही स्वर पार्श्व-मौना वेदना की गति अनामय!
लौट आएगी अधर-तट फिर हृदय की प्रार्थना,
मंदिरों में शंख-स्वर हर भोर जैसे लौट आते।
बोध की बीहड़ धरा पर ध्वंस के अवशेष सी स्मृति,
कल्पना की रंजना के शक्तिशाली राज वैभव!
चेतना निर्वेद,लोचन-वेद, मन में खेद की ध्वनि,
दृष्टि में इक आत्म-हन्ता का विकल चीत्कार-रौरव।।
लौट आएगी विकल-तट पर हृदय की कामना,
नीड़ में खग-दल स्वतः हर सांध्य जैसे लौट आते।
शुभ्र-विलसित काननों में लौटता जैसे अँधेरा,
क्रोध से आक्रांत नद-जल ज्यों परिधि में लौटता है।
लौट आते हैं समर से ज्यों थके हारे सिपाही,
प्रेम में विक्षिप्त नायक ज्यों स्व-विधि में लौटता है।
लौट आएगी कलम-घट स्याह होकर सर्जना,
पूर्ण कर वनवास फिर गृह राम जैसे लौट आते।
GARIMA MISHRA