मत बाँध बटोही मिलन पाश

क्षण-क्षण पर सिञ्चित है प्रवास,
मत बांध बटोही मिलन-पाश।।

निर्झरझरित नयन की पीड़ा,
यह श्वासों की झंकृत-वीणा।
क्षण-स्पंदन की अंतर्ध्वनियाँ,
स्फटिक-शिलाएं,दीपित-मणियाँ।
मन-चन्चरीक-गति बांध-बांध
जो लाते चेतन तल प्रभास।
रह जा इनके ही आस-पास,
मत बांध बटोही मिलन-पाश।

अब देख कल्पना के थल पर,
उस नील-सरोवर-जल-तल पर।
कुछ तो यथार्थ के बिम्ब मिलें,
जीवन गति के प्रतिबिम्ब मिलें।
अन्यथा प्राण के वृक्ष तले,
झर जानी है यह श्वास-श्वास।
ज्यों झरते निर्जन में पलाश,
मत बांध बटोही मिलन-पाश।

कुछ नियति स्वयं देती सबको,
कुछ करता है मानव प्रयास।
सर्जना शेष रह जाती है,
छाता जो भू पर कभी-नाश।
जैसे पत्थर की टूटन से,
पाती प्रतिमा है मृदुल-हास।
फिर बन पत्थर,क्यों है उदास?
मत बांध बटोही मिलन-पाश।
GARIMA MISHRA

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