GARIMA MISHRA

दीप सी उद्विग्न-समिधा अब प्रभा सी हो गयी है।
जो प्रवासी थी व्यथा वह,अब निवासी हो गयी है।
थी अमावस गति हमारी,पूर्णमासी हो गयी है,
आंख गङ्गा हो गयी है,दृष्टि काशी हो गयी है।।
GARIMA MISHRA