Anis shah anis

दाद-ओ-तहसीन-ओ-सताइश न पज़ीराई को
कोई आया न मेरी हौसला-अफ़जाई को

देख तो लूं मैं ज़रा पैकर-ए-रानाई को
छीन लेना तू भले बाद में बीनाई को

जो भी रौशन थे बुझा कर सब उमीदों के चराग़
सो गये आज भी हम ओढ़ के तन्हाई को

रोज़ ही ज़ुल्मो-सितम और बढ़ा देता है
नापता है वो मेरे ज़ब्त की गहराई को

मेरे सीने के सभी ज़ख़्म उधड़ जाते हैं
याद करता हूँ कभी जो तेरी अँगड़ाई को

दोस्त भी अब सफ़-ए-दुश्मन में नज़र आते हैं
जब से होठों पे सजा रक्खा है  सच्चाई को

लफ़्ज़ों के फूलों में मफ़हूम की ख़ुशबू ही नहीं
कैसे कह दूँ मैं ग़ज़ल क़ाफ़िया-पैमाई को

उसने ही मेरा बनाया है तमाशा ऐ 'अनीस'
मान बैठा था फ़िदाई मैं तमाशाई को
Anis shah anis

Anis shah anis | We The Sukhanwar