रूबरू हम चाँद-तारों के नज़ारे देखते हैं,
जब तिरी आँखों में हम रौशन सितारे देखते हैं।
रात-दिन बस ढूँढती हैं अपनी मंज़िल ये निगाहें,
इस नदी में बहते-बहते हम किनारे देखते हैं।
होंठ तो ख़ामोश हैं पर, बात होती है नज़र से,
आँख से ही यार के हम बस इशारे देखते हैं।
वक़्त की आँधी चली जब ज़िन्दगी में बेबसी से,
ख़्वाब अपने टूटते हम आज सारे देखते हैं।
ज़ुल्मतों में ढूँढते हम रौशनी के सिलसिले को,
राख के इस ढेर में बस हम शरारे देखते हैं।
छोड़ 'क़ाज़ी' अब ज़माने से वफ़ा की आस रखना,
लोग तो बस दूर से ही ग़म हमारे देखते हैं।
Dr Wasif Quazi