Anuj Abr

सूरत-ए-अश्क इन आँखों से निकलकर शीशे
कर गए हिज्र को बदनाम पिघलकर शीशे

मैं भी दालान की कुर्सी को हटाकर ख़ुश हूँ
वो भी है चैन से खिड़की के बदलकर शीशे

तू मुझे तोड़ मगर देख! सँभलकर थोड़ा
तेरी आँखों में न चुभ जाएँ उछलकर शीशे

वो भला इश्क़ के आदाब कहाँ समझेगा
जिसने देखे ही नहीं हाथ से मलकर शीशे

"अब्र" ये ताज मेरे सर पे नहीं है यूँ ही
अपने पैरों से मैं आया हूँ कुचलकर शीशे
Anuj Abr

Anuj Abr | We The Sukhanwar