हमारी सोच

दरवाजे की नीम हटाकर,
हमने ताड़ के वृक्ष लगाए।
ये तरुवर बस शोभनीय है, यह कब कैसे छांव करेगा।

सत्य मौन था उसे नकारा,
बड़बोले को सहमति दी है।
हमने कोयल सदा चिढ़ाई,
पर कौवों की पूजा की है।
जब कि है यह ज्ञात हमे कि, बोलेगा तो "कांव" करेगा।

मीठी बातें बस बातें हैं,
उन बातों में हम आ जाते।
भूखों को बारूद खिलाकर
हम पत्थर को दूध पिलाते।
हर पत्थर की जात वही है, लग जाए तो घाव करेगा।

चमकीले रैपर में लिपटे
बिकते सपनो के हम आदी।
स्वप्न देख "स्मार्ट सिटी" का,
घर ले आये हम बर्बादी।
शहर भला क्या वो सुख देगा, जो संतुष्टी गांव करेगा।
Puspendra Srivastava