निर्जन वन भी झुलस-गया है, अब अवशेष न देखो जोगी।
मेरा भेष न देखो जोगी।
मुझमें अग्नि प्रवाहित होती,
मैं रस-युक्ता नदी नहीं हूँ।
जिसमें जीवन दर्शन उपजे,
मैं वह पावन सदी नहीं हूँ।
मैं मरुथल की झंझा भर हूँ, तुम अनिमेष न देखो जोगी।
मेरा भेष न देखो जोगी।
मैं उपयुक्त नहीं इस जग के,
सुखराशि नहीं मेरी सरिता।
मैं क्रंदन का प्रथम-अश्रु हूँ,
त्याग-गान है मेरी कविता।
जाओ! रजनी के सहचर हो, मेरे केश न देखो जोगी।
मेरा भेष न देखो जोगी।
मिटे कटीले गझिन गाझ भी,
नागफ़नी का लोक नहीं है।
बस इसमें निर्वात बसा है,
क्लेश, व्याधि, दुख, शोक नहीं है।
पंचतत्त्व की रेत समझ लो,इसमें शेष न देखो जोगी।
मेरा भेष न देखो जोगी।
GARIMA MISHRA