Arshad Rasool Badayuni

ज़माने में कोई अपना नहीं है
किसी से अब हमें ख़तरा नहीं है

मैं तन्हा दुख से लड़ना चाहता हूँ
मगर घर में अलग कमरा नहीं है

अधूरी है दिखावे की इबादत
मुकम्मल एक भी सजदा नहीं है

अगर ज़हमत न हो इंसान बन जा
ये मेरी राय है, फ़तवा नहीं है

सितम का सिलसिला जारी रखो तुम
अभी दिल ठीक से टूटा नहीं है

ज़माने में सभी अपने हैं 'अरशद'
ज़रूरत पर कोई अपना नहीं है
Arshad Rasool Badayuni