Dinesh Kumar

माँग लो एक तारे से गिरते हुए
ज़िंदगी ख़ुश-नुमा हो ये ढलते हुए

कोई परवानों को रोक सकता है क्या
शम्अ का हुस्न देखो तो जलते हुए

याद आने लगी फिर पुरानी सदी
चिट्ठियाँ अब रुला देंगी पढ़ते हुए

आख़िरी साँस तक कुछ न कुछ सीख लूँ
कैसे मरते हैं सीखूँगा मरते हुए

आख़िरी जाम नमकीन फिर बन गया
साक़ी रोया न कर जाम भरते हुए

अब मुलाक़ात फिर हो न हो क्या पता
हो रहा हूँ मैं रुख़्सत भी डरते हुए
Dinesh Kumar