चढ़ी जो धूप तो इक-इक शजर की याद आई
नए सफ़र में पुराने सफ़र की याद आई
उधर गए तो इधर की कमी हुई मह़सूस
इधर जो आए तो हर पल उधर की याद आई
हर एक लफ़्ज़ का हर हर्फ़ भीग-भीग गया
जो तेरे ख़त से तिरी चश्म-ए-तर की याद आई
हर अजनबी में शनासा तलाश करते रहे
पराए देश में जब अपने घर की याद आई
वो और थे जिन्हें याद आया दश्त में दरिया
हमें तो दश्त में दीवार-ओ-दर की याद आई
भुला ही बैठा था दानों के फेर में सब कुछ
क़फ़स में जाके परिंदे को पर की याद आई
Rajesh Reddy