मोहब्बत में कहीं कमज़ोर गर कोई कड़ी होगी
सबब इसका कहीं घर बार या तो नौकरी होगी
हम अपने आपको वसुदेव कर लेंगे यक़ीं जानो
हमारी खोज में जिस रोज़ कोई देवकी होगी
हमारे जैसे कुछ दरवेश कर लेते हैं अंदाज़ा
कहाँ पर गुफ़्तगू होगी कहाँ पर शायरी होगी
मिटाना चाहते हैं जो मिटा दें शौक़ से मुझको
मगर अश’आर में हरदम मिरी मौजूदगी होगी
अगर हम दोनों बिछड़ेंगे तो फिर मंज़र अजब होगा
कहीं अर्थी सजी होगी कहीं पर पालकी होगी
अगर मैं हो गया दुनिया तेरी मसनद पे स्थापित
मेरे दुश्मन के घर में भी ख़ुशी से आरती होगी
वो मेरा दोस्त जो दुश्मन की सफ़ में हो गया शामिल
मुझे मालूम है उसकी कहीं पर नस दबी हो
हज़ारों फ़लसफ़े और डिग्रियाँ भी फेल हो जाएँ
तुम्हारी आँखों पे जिस दिन कोई भी इस्टडी होगी
Shivsagar Sahar