जो लोग दिल से बाख़बर नहीं हुए तो क्या हुए
ग़मों से आशना अगर नहीं हुए तो क्या हुए
वो रूह का सुकून हैं कि जिसके तुम ग़ुरूर हो
कहो? कभी वो दर्दे-सर नहीं हुए तो क्या हुए
जो याद के हैं चंद पल, सो दुश्मने-हयात हैं
गर आपसे ये दरगुज़र नहीं हुए तो क्या हुए
दुखों की मार से कभी जो अश्क टपके आँख से
वो अश्क जानेमन, गुहर नहीं हुए तो क्या हुए
है ख़ून किस के रंग का, है आब किसके रूप का
शनासा तुम से मोतबर नहीं हुए तो क्या हुए
अब 'आज़म' और आपसे कहें तो क्या कहें! सुनो
कि अहले-दिल जो बाहुनर नहीं हुए तो क्या हुए
Mohammed azam wasi