यूं तो सारे इस जगत में चाहते आलोक हैं
पर किसी को तम अगर भाया है, तो
फिर क्या करोगे?
धान्य की अभिलाष रखना रिक्तियों को छोड़ कर के
व्यर्थ ही उत्सव मनाना शान्ति से मुख मोड़ कर के
रिक्त हृदयों से नई रंगोलियों का स्वांग रचना
और गमलों को सजाना डालियों को तोड़ कर के
हो रहे उत्सव सभी सौभाग्यशाली लोक है
पर किसी के भाग्य न आया है, तो
फिर क्या करोगे?
है बहुत मुश्किल नये इक पंथ का विस्तार करना
हो चुके पाषाण हृदयों को पुनः त्योहार करना
नेह की टूटी हुई माला को फिर से जोड़ना और
जगमगाते दीपकों में स्वप्न को साकार करना
जल रहे सपने चिता सम बस इसी का शोक है
पर किसी की न समझ आया है, तो
फिर क्या करोगे?
शुभम तिवारी