Shravan Kumar

हैरान है ज़माना नन्हीं सी जान से
हटती नहीं नज़र ही जिसकी उड़ान से

आसान है समझना हर चाल आपकी
हम रूबरू हैं क़दमों के हर निशान से

रहती नहीं निगाहें काबू में आपके
अल्फ़ाज़ भी फिसलते हैं अब ज़ुबान से

तालीम ले रहा था ऊँची उड़ान की
मैं दूर जब तलक था इस आसमान से

मासूम वो परिंदे सब उड़ गए हैं क्या
आती नहीं सदा अब कोई मकान से
Shravan Kumar