Mohit Subran (मोहित सुब्रन)

वक़्त ने कर दिया धोके के हवाले मुझको
चाबियाँ ग़ैरों को दीं और दिए ताले मुझको

सब हैं मसरूफ़ यहाँ अपनी किसी जन्नत में
किस को पर्वा कि जहन्नम से निकाले मुझको

दोस्त वो ग़म है जो इतनी से नहीं जाएगा
आधे ख़ाली नहीं भर के दे पियाले मुझको

अब तो रातों के अँधेरों से है निस्बत ऐसी
कि बहुत चुभते हैं दिन के ये उजाले मुझको

जो कि दरिया को निगल जाए मैं वो सहरा हूँ
फिर भला कैसे कोई अपना बना ले मुझको

ये इरादा तो नहीं फिर भी कभी रस्सी पे
जो गला फिसले तो कोई न सँभाले मुझको

राख का ढेर हूँ अब मुझ में नहीं चिंगारी
ऐ हवा अब तू जहाँ चाहे उड़ा ले मुझको

ज़ीस्त है एक भँवर फँस गया हूँ मैं जिस में
मौत तू हाथ बढ़ा कर के बचा ले मुझको

अब तो बस एक ही ख़्वाहिश रही है दिल को मिरे
एक दिन यूँ हो कोई हादसा खा ले मुझको
Mohit Subran (मोहित सुब्रन)