कहानीकार हैं किरदार आँसू
यही बुनियाद हैं दो-चार आँसू
शब-ए- ग़म रौशनी जो चार-सू है
जलाए जा रहे हैं यार आँसू
ये सुनकर लोग क्यूँ हैरत-ज़दा हैं
कि कैसे पी गए दीवार आँसू
ज़रा सी छेड़खानी औ रवाना
किनारे पर खड़े तैयार आँसू
सहूलत ही परेशानी है मेरी
ग़म-ए-दुनिया इधर उस-पार आँसू
बुलंदी पर है सर सो एहतियातन
यहाँ रक्खे गए दस्तार आँसू
समझनी है मुझे इसकी हक़ीक़त
किसी ने क्यूँ कहा औज़ार आँसू
कोई क्या छीन लेगा मेरा हिस्सा
मेरी दौलत मेरा घर-बार आँसू
तेरी यादों पे ख़र्चा है ज़ियादा
तेरी तस्वीर पे बस-चार आँसू
Nivedan Mishra