Deepak Sopori

ज़िंदगी क्यों कश्मकश को खुद ही सुलझाती नहीं ,
बस इशारे दे रही है राज़ बतलाती नहीं।

इश्क़ का रस्ता बताना इसलिए भी है कठिन,
इक सड़क जाती तो है पर लौटकर आती नहीं।

टकटकी बाँधे वो पहरों गुफ़्तगू करना और अब,
बात करना दूर है नज़रें भी टकराती नहीं ।

आ रही है दिल की बातों को सुनाने में हया,
हाँ ज़रा आती तो है पर उतनी भी आती नहीं।

क्यों अधूरा रह गया है पूछते थकती नहीं,
क्या अधूरा रह गया है मुझसे कह पाती नहीं ।

मेरे दो महबूब हैं जिनका तजाज़ुब देखिए,
दर्द भी जाता नहीं और जान भी जाती नहीं।

उँगलियों में एक ख़त चेहरे पे नक़्शा दश्त का,
कौन कहता था वो तूफ़ाँ से भी घबराती नहीं ?

अश्क़ और पानी के धुँधले फ़र्क से वाक़िफ़ हूँ मैं ,
हाँ मैं शा’इर हूँ मगर इतना भी जज़्बाती नहीं।
Deepak Sopori