देना पहलू में आसरा मुझको
इतना क़ाफी है दिलरूबा मुझको
मेरी कमियाँ मुझे गिनाता है
मेरे कमरे का आईना मुझको
तुझ को पागल बना न दे जानाँ
देर तक शब में सोचना मुझको
तुझ में खो जाऊँ यूँ, कि कहने लगें
दुनियावाले भी गुमशुदा मुझको
मुझ को देता है मंज़िलों का पता
मेरे पैरों का आबला मुझको
शब-ए-हिज्राँ का डर दिखाता है
वस्ल का एक देवता मुझको
फूल आयत के खर्च मत कीजे
रास आती नहीं दुआ मुझको
सारी बस्ती में गूंगे रहते हैं
कौन देगा भला सदा मुझको
खा रहा हूँ प' कब तलक साहिल
ज़िन्दा रक्खेगी ये दवा मुझको
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"