इश्क़ में ऐसी आवारगी या सनम
कौन समझे मेरी बेख़ुदी या सनम
ख़्वाब आँखों से गिरते रहे नीम-जाँ
हम ने देखा यही तीरगी या सनम
जिस्म फ़ानी है बाक़ी फ़क़त नाम है
और क्या हो भला ज़िंदगी या सनम
आईनों में कई चेहरों का हश्र था
कौन टूटा यहाँ वाक़ई या सनम
सिर्फ़ सज्दों से हासिल नहीं मारिफ़त
औरतों से अता आगही या सनम
ख़ाक होने में 'कामिल' हरज क्या यहाँ
ख़ाक देती नई रौशनी या सनम
Kunal kumar