मुहब्बत का तेरी असर हो गया है
ज़माने से दिल बेख़बर हो गया है
सितारों से आगे निकल कर तो देखो
ये नीली फ़ज़ा का सफ़र हो गया है
दिखाया है क्या आईना सादगी का
परेशां वो रश्क-ए-क़मर हो गया है
जहाँ थक के बैठूँ वहीं छाँव होगी
दुआ का मिरी ये असर हो गया है
नज़र जब मिली है हसीं चाँदनी से
चमकता हुआ ये शजर हो गया है
उसे अब ज़माने की परवाह ही क्या
जो 'क़ाज़ी' तेरा हम-सफ़र हो गया है
Dr Wasif Quazi