राब्ता नींद का रातों से सँवर जाएगा
ख़्वाब उन का मेरी आँखों में उतर जाएगा
अक्स तेरा जो मयस्सर हो कभी आईने को
नूर बन कर वो मिरे घर में बिखर जाएगा
काँच के घर हैं तो दुनिया से शिकायत क्या है
गर हैं पत्थर तो मुक़द्दर में, बिखर जाएगा
जिस तरफ़ देख ले वो अपनी गुलाबी आँखें
मंज़र-ए-दहर उसी वक़्त सँवर जाएगा
ज़िक्र जब होगा ज़माने में वफ़ा का 'क़ाज़ी'
नाम तेरा भी इबादत में उभर जाएगा
Dr Wasif Quazi