ये किस के बोए हुए शज़र हैं
कि जिन के साए में रह-गुज़र हैं
अगल-बगल है अजीब दुनिया
मिरी गली में उदास घर हैं
ये मीठी बातें बनाने वाले
मुनाफ़िक़ों से भी पेशतर हैं
तुम्हारी दुनिया के कायदे तो
अजीब से भी अजीब-तर हैं
ये आँख में हैं जो क़ैद मंज़र
यही समझिए नदी में घर हैं
वजूद की बात उन्हीं से कहिए
जो अपने होने से बे-ख़बर हैं
नहीं है कोई अब एकतरफा
सभी इधर हैं सभी उधर हैं
उतार लाओ ज़मीं पे जन्नत
ख़ुदा बुलाओ यहाँ बशर हैं
दिलों से दिखती है उनको दुनिया
जो लोग कहते हैं बे-नज़र हैं
बदन पे उभरेंगे कुछ दिनों में
जो दाग़-धब्बे कमीज़ पर हैं
Nivedan Mishra