Nivedan Mishra

हकीमों को मरहम बनाए हुए भी
ज़माना हुआ ज़ख़्म खाए हुए भी

न रोए हैं मुद्दत से जी भर के हम लोग
बरस हो गए मुस्कुराए हुए भी

किसी ने गुज़िश्ता कुरेदा ज़रा सा
उभर आए हैं कुछ मिटाए हुए भी

तकल्लुफ़ नहीं दोस्ती में ज़ियादा
चले आए हैं बिन बुलाए हुए भी

ख़ुशी से पलक पर उठाते हैं आँसू
किसी की नज़र से गिराए हुए भी

लतीफ़े वही चार-छह हैं पुराने
सुनाते रहे हैं सुनाए हुए भी

मसीहाई की दाद दीजे बहरहाल
कि चलने लगे लड़खड़ाते हुए भी
Nivedan Mishra

Nivedan Mishra | We The Sukhanwar