Kunal kumar

इक बूँद है जो मेरी नज़र ढूँढ रही है,
वीरान सी आँखों में सहर ढूँढ रही है।

इस शहर के चेहरों में बहुत शोर मिला पर,
इस शख़्स को नायाब कमर ढूँढ रही है।

मंज़िल ने कई बार मुझे राह दिखाई,
अब राह मिरी गर्द-ए-सफ़र ढूँढ रही है।

कुछ लोग मेरी हार पे खुश होके मिले थे,
हाँ जीत मेरी उनका जिगर ढूँढ रही है।

दीवार पे टंगा हुआ था नाम पुराना,
तन्हाई उसे शाम-सहर ढूँढ रही है।

कामिल की ख़मोशी से खुले कितने दरीचे,
हर गूँज उसी लब का असर ढूँढ रही है।
Kunal kumar