Nivedan Mishra

साँस-दर-साँस तुझे छोड़ के जाते हुए हम
जिंदगी चुप हैं बहुत शोर मचाते हुए हम

आइना जैसा कोई शख़्स नज़र आता है
क्या बनाते हैं तेरा नक्श बनाते हुए हम

दास्ताँ याद तो रहती है मगर बेसब्री
भूल जाते हैं तुझे ख़्वाब सुनाते हुए हम

याद करते हैं बहुत खोए हुए अपनों को
रह-गुज़ारों की तरफ हाथ हिलाते हुए हम

फिर से पाए गए दीवार से बातें करते
एक तस्वीर को आवाज़ लगाते हुए हम

बे-तरह ज़ख़्म प हँसते हैं ग़म-ए-दुनिया पर
और रोते हैं कभी जश्न मनाते हुए हम

तेरी आँखों की चकाचौंध में ऐसा उलझे
वापसी भूल गए दश्त में जाते हुए हम

इसलिए दौड़ में निकला है ज़माना आगे
थक गए वक़्त की रफ़्तार बढ़ाते हुए हम

एहतियातन कि नहीं देखने पाए कोई
यूँ नज़र आएं तेरी आँख में आते हुए हम

उसने भेजा था फरिश्तों से भरी दुनिया में
लौट आए हैं यहाँ ख़ाक उड़ाते हुए हम

ज़िंदगी लुत्फ़ उठाती है मज़े करती है
ख़र्च होते हैं यहाँ साँस कमाते हुए हम
Nivedan Mishra