मुहब्बत की कोई निशानी तो दो
हमें अपनी आँखों का पानी तो दो
अधूरे सफ़र में ठहर जाएँ हम
थकन को कोई सायबानी तो दो
जहाँ दर्द अपनी हदें तोड़ दे
हकीकत को वो जावेदानी तो दो
सुलगती हुई धूप के शहर में
शजर को कोई मेहरबानी तो दो
अधूरी इबादत न रह जाए ये
मुहब्बत को 'वासिफ़' निशानी तो दो
Dr Wasif Quazi