Anuj Abr

कोई इल्ज़ाम मेरे सर पे लगाए, जाए
दिल से अपने वो मेरा नाम मिटाए, जाए

कुछ ज़ियादा ही ज़रूरी हो उसे काम अगर
मेरी मय्यत से वो कांधे को हटाए, जाए

जिसकी आँखों को अखरते हों मुहब्बत के चराग़
अपने हाथों से चराग़ों को बुझाए, जाए

और फिर छोड़ दिया मैंने वहीं उसका हाथ
कह रहा था वो बड़ी देर से जाए, जाए

एक दिन था कि टिकी रहती थी नज़रे उसपर
अब तो जो चाहे तेरी बज़्म में आए, जाए

मैं अगर संग हूँ रस्ते का तो मारे ठोकर
फूल हूँ मैं तो सलीक़े से उठाए, जाए

'अब्र' जिस बात पे वो छोड़ रहा है मुझको
अहल-ए-दुनिया को वो ये बात बताए, जाए
Anuj Abr