रात ढलते ही यहाँ फिर दिन नया हो जाएगा
ख़त्म सारा एक दिन ये मसअला हो जाएगा
वक़्त की ठोकर से पत्थर मोम बन के पिघलेंगे
सख़्त लहजा भी किसी दिन नर्म सा हो जाएगा
ज़ख़्म भर भी जाएँ पर क्या दर्द ये टल पाएगा?
तूने क्या सोचा कि सब कुछ पहले सा हो जाएगा
Deepanshu chaudhary