इस दौर-ए-मुहब्बत को मिटने से बचा लेना,
जब भी मेरी याद आए, अश्कों को छुपा लेना।
आँखों में समा लेना यादों के हसी मंज़र,
बिखरे हुए लम्हों को एक बार सजा लेना।
जाते हुए इस दिल से गर तुमको अज़ीयत हो,
तुम दस्ते-मुहब्बत से दामन को छुड़ा लेना।
मैं देख न पाऊँगा ख़ुद जैसा कोई मुजरिम,
तुम मुझसे किए वादे औरों से निभा लेना।
जब दिल से पशेमा हो तुम अपनी ख़ताओं पर,
तब हाथों को अपने तुम बख़्शिश को उठा लेना।
जब मुझसे मिलो तुम बस इतना ही करम करना,
आदाब-ए-मुहब्बत से नज़रों को झुका लेना।
Kamran Abbas