एक तो ये हो कि मलाल न हो
ज़िंदगी में कोई कमाल न हो
रूह में बा-बदन उतर जाए
कोई इस दर्ज़ा हम-ख़्याल न हो
चुप्पियों पर अमल ज़रूरी है
एहतियातन कोई सवाल न हो
अब भी ताज़े हैं और गहरे हैं
इतनी ज़ख़्मों की देखभाल न हो
अब नुमाइश नहीं हो फूलों की
और आँसू का इस्तिमाल न हो
तब्सिरा दोस्ती पे हो खुल कर
इश्क़ की बात बहर-हाल न हो
ख़ुशबुएँ एतराज़ करती हैं
अब यहाँ कोई गुल-मिसाल न हो
राइगानी मिसाल बन जाए
हश्र इतना भी बा-कमाल न हो
Nivedan Mishra