Nivedan Mishra

बद-हवासी पहन के निकले हैं
हम उदासी पहन के निकले हैं

आँसुओं से बदन लबालब है
रूह प्यासी पहन के निकले हैं

जिस्म को आईना किया सब ने
बे-लिबासी पहन के निकले हैं

इक बदन की सुपूर्दगी है आज
सब उदासी पहन के निकले हैं

जानते हैं कपास का मज़हब
जो सियासी पहन के निकले हैं

कितना रंगीन है जो सादापन
गाँव-वासी पहन के निकले हैं

शहर में ढूँढने चले क़ातिल
ख़ूँ-लिबासी पहन के निकले हैं

दर्द के तज़्किरे से याद आया
ज़ख़्म बासी पहन के निकले हैं

नींद दफ़्तर लिए चले आए
सब उबासी पहन के निकले हैं
Nivedan Mishra