गुज़री तमाम उम्र ग़म-ए-रोज़गार में
पाया न चैन हमने कभी इस दयार में
वो दिन भी थे कि मिन्नत-ए-राहत फ़ुज़ूल थी
अब लुत्फ़ ढूँढते हैं दिल-ए-सोग़वार में
जिसको भी देखिये वो अकेला मिला हमें
कितने ही क़ाफ़िले थे हद-ए-रहगुज़ार में
आसान कब था हिज्र की रातों को काटना
सदियों की प्यास जागी है इक इंतज़ार में
Fazal Abbas Aabdi