कभी दुआ तो कभी इक असर तुम्हारी नज़र,
मेरे तमाम दुखों का मफ़र तुम्हारी नज़र।
हज़ारों लोग यहाँ डूब कर सँभल न सके,
अजब है एक तिलिस्मी भँवर तुम्हारी नज़र।
तमाम उम्र की प्यास एक पल में बुझ जाए
पिला दे गर मुझे 'जाम-ए-शकर' तुम्हारी नज़र
झुकी ही रहने दो आँखे ये मत उठाओ इन्हें
करेंगी फ़ित्नों को ज़ेर-ओ-ज़बर तुम्हारी नज़र
न जाने कौन-सी रंज़िश की दे रही है सज़ा
हमारे क़ल्ब पे ढा कर क़हर तुम्हारी नज़र
अदा-ए-नाज़ में भी इक हया की चादर है
ग़ज़ब का ओढ़े हुए है हुनर तुम्हारी नज़र
हज़ारों मंज़िलें कदमों में आके गिर जाएँ
इशारा कर दे जो सू-ए-सफ़र तुम्हारी नज़र
फ़लक से नूर की ख़ैरात माँगूँ किसलिए जब
बना दे ख़ाक को शम्स-ओ-क़मर तुम्हारी नज़र
दलील-ए-हुस्न हैं आरिज़ भी और गेसू भी
है हर किसी पे मुसल्लत मगर तुम्हारी नज़र
है 'फज़्ल' हासिल-ए-हस्ती, यही तमन्ना भी
तमाम उम्र हो पेश-ए-नज़र तुम्हारी नज़र
Fazal Abbas Aabdi