यदि प्रिये! मुझे अपना लो तुम, जीवन-होली हो जाए अमर!
मानूँगा मैं होली आई, जब साथ तुम्हारा हो आँचल;
नयनों में उमड़ें मेघ-सघन, बाँहों का हो कोमल सन्दल।
तन भीगे बहिरंगों से पर, मन प्रेम-रंग-धन से भीगे;
निज प्रेम-रंग है उज्ज्वलतम्, इस भाँति कि हीरक-दुग्ध-धवल!
यदि प्रिये! तुम्हारा साथ मिले, तो प्रीत-रंग यह जाए निखर;
यदि प्रिये! मुझे अपना लो तुम, जीवन-होली हो जाए अमर!
कब प्रेम, कहाँ, किससे होगा? यह कौन जानता जीवन में?
संज्ञान अगर हो प्रेम-रूप का, होगा क्या वह बंधन में?
यद्यपि मैं सत्य जानता हूँ, पर कैसे मन को समझाऊँ?
किसने देखा है, कल क्या होगा—नभ-तल के इस आँगन में?
क्षणभंगुर जीवन जाने कब, क्षण भर के भीतर जाए ठहर;
यदि प्रिये! मुझे अपना लो तुम, जीवन-होली हो जाए अमर!
क्षण भर का उत्सव-मेला फिर, चिर काल अनंत अँधेरा है;
क्षण भर का सुख ही पीर बने, यह काल-चक्र का फेरा है।
जीवन का मिलना भाग्य, मगर—सौभाग्य रहे, तब प्रेम मिले;
जब सर्व दीप बुझ जाते हैं, तब करता प्रेम सवेरा है!
यदि प्रेम-सुधा बरसा दो तुम, बिखरा जीवन यह जाए सँवर;
यदि प्रिये! मुझे अपना लो तुम, जीवन-होली हो जाए अमर!
क्या ऐसी होली हो सकती—तम-निशा दिवाली बन जाए?
सूखे तृण भी हर्षित हो लें, कालिख भी लाली बन जाए?
नभ-धरा प्रणय हो क्षितिज परे, ऐसा सुयोग क्या संभव है?
कंटक-पथ पर हम चलें नहीं, जीवन हरियाली बन जाए?
मैं आशा-बीज लिये बैठा, तुम बो दो यदि, हो जाए गुहर;
यदि प्रिये! मुझे अपना लो तुम, जीवन-होली हो जाए अमर!
Vishal Ojha 'Ehsaas'