इस दास्ताँ को फिर से नया कोई मोड़ दे
टूटा हुआ हूँ पहले से कुछ और तोड़ दे
अब देके ज़ख़्म मेरे सितमगर खड़ा है क्यों
मिर्ची छिड़क दे ज़ख़्म पे नींबू निचोड़ दे
बर्बाद हम हुए कि तेरे मन की हो गई
अब जाके नारियल किसी मंदिर में फोड़ दे
उकता गया क़फ़स में है सय्याद अब तो दिल
ऐसा न कर कि तू मेरी गर्दन मरोड़ दे
तुझको भी पत्थरों से रहम की उमीद है
नाहक पटक-पटक के न सर अपना फोड़ दे
क़ातिल ही ऐ ‘अकेला’ अचानक पलट गया
मैंने कहाँ कहा था "मुझे ज़िन्दा छोड़ दे?"
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'