पड़ते जहाँ भी साये तुम्हारे ज़मीन पर,
होते वहाँ अजीब नज़ारे ज़मीन पर।
माना कि हैं ज़मीन से तारे बड़े-बड़े,
पर लोग हैं कि लाएँगे तारे ज़मीन पर।
इस हार का ज़रा भी उन्हें है नहीं मलाल,
कि आसमाँ में जीत के हारे ज़मीन पर।
पानी के देवता को क्या ये है नहीं ख़बर,
पानी के कैसे-कैसे हैं मारे ज़मीन पर?
आँखों में जो ये ख़्वाब थे, आँखों में थे सही,
क्या सोचकर ये तूने उतारे ज़मीन पर।
ढूँढें कहाँ-कहाँ तेरे क़दमों के हम निशाँ,
पड़ते कहाँ हैं पाँव तुम्हारे ज़मीन पर।
D Darsh