Kunal kumar

शराफ़त हया आब तकरार में हैं
मुक़र्रर कहो होंठ दीदार में हैं

इबादत निगाहें सबा है सुख़न की
अस्ल लुत्फ़ तो जान इज़हार में हैं

ज़रा बच बचा कर रहो अब यहाँ पे
बुरे बुलहवस लोग सरकार में हैं

मिरा बस चले तो बढ़ा दूँ क़दम पर
गरीबी मकाँ यार दस्तार में हैं
Kunal kumar