Rubi Gupta satyendra

लोग आगाज़ को अंजाम समझ लेते हैं
जाने क्यों सुब्ह को ही शाम समझ लेते हैं

ये भी मुमकिन है कि दुनिया को बदलकर रख दे
लोग जिस शख़्स को नाकाम समझ लेते हैं

जिसको करने से ज़रा दिल को सुकूं मिल जाये
हम उसी काम को आराम समझ लेते हैं

अपने चेहरे को नकाबों में छुपा लेती हूँ
इसलिए वो मुझे गुमनाम समझ लेते हैं

आईना बनने की चाहत नहीं कीजे 'रूबी'
लोग सच कहने को इल्ज़ाम समझ लेते हैं
Rubi Gupta satyendra