आँखें आँसू से हैं नमहाँ इतने मजबूर हैं हमकीमत जो रखी थी उसनेहम थे उससे थोड़े कमआँखें यूँ भर आईं जैसेफूलों पर बिखरी शबनमटूटा शीशा जोड़ रहेपत्थर को समझाकर ग़मABHISHEK SONI