वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

कौवे कई पधार चुके हैं मचान पर।
अब तब्सिरा करेंगे वो कोयल की तान पर।

लोगों ने चीख- चीख के हालत बिगाड़ ली,
रेंगी कहाँ है जूँ भी मगर उनके कान पर।

औरों का ख़ून चूस के मोटा हुआ है जो,
उपदेश दे रहा है वो विधि के विधान पर।

बरसों हमारी अक़्ल पे ताला पड़ा रहा,
करते रहे भरोसा किसी बेईमान पर।

पंछी के 'पर' कतर के ये सय्याद ने कहा-
जाना है जाओ शौक़ से ऊँची उड़ान पर।

ख़ूबी कहो इसे या हमारी कमी कहो,
जो है हमारे दिल में वही है ज़ुबान पर।

इक रोज़ ऐ 'अकेला' वो आएगा लौट के,
चैनो-क़रार है इसी वह्मो-गुमान पर।
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

वीरेन्द्र खरे 'अकेला' | We The Sukhanwar