हुई है यादों की तश्कील कोई पिछली रात
दुखों में हो गई तब्दील कोई पिछली रात
न जाने कर गया रौशन हमारे ज़हन में कौन
तुम्हारे नाम की क़िन्दील कोई पिछली रात
पड़ा था सामने रिश्तों की अस्थियों का कलश
हर एक आँख थी इक झील कोई पिछली रात
न लोग साथ जुड़े और न कारवाँ ही बना
चले थे हम भी कई मील कोई पिछली रात
तेरी शबीह को देखा तो पर निकल आये
चहक रही थी फिर इक कील कोई पिछली रात
जो राहे इश्क़ में रहबर थी मेरी ऐ साहिल
कि बुझ गई है वो क़िन्दील कोई पिछली रात
Shashank Singh Thakur "SAAHIL"