Anuj Abr

घन्टी बजे, पुकार उठे, रौशनी दिखे
आनी है कोई ट्रेन तो आती हुई दिखे

माना कि जीतने पे मेरे ख़ुश बहुत हैं आप
चेहरे से आप के भी मगर कुछ ख़ुशी दिखे

ये देखना कि लफ़्ज़ बरतते हैं किस तरह
तुमको अगर कहीं पे ग़ज़ल मीर की दिखे

अहल-ए-चराग़ तब हो तेरी रहमतों का ज़िक्र
रौशन हर एक गाँव की जब झोपड़ी दिखे

मैं काटने को अब्र शब-ए-हिज्र काट लूँ
लेकिन कहीं से वस्ल का इम्कान भी दिखे
Anuj Abr

Anuj Abr | We The Sukhanwar