देखकर जो नहीं चलते वो फिसल जाते हैं,
पर जो होते हैं समझदार सँभल जाते हैं।
अब ज़रूरी है कि शो'लों को हवायें न मिले ,
जिनको जलना हैं वो फूलों से भी जल जाते हैं।
हमको दुनिया के तबीबों की ज़रूरत ही नहीं।
हम तो बस आप के दर्शन से बहल जाते हैं।
उसकी हो जाती है जब चश्म ए करम कश्ती पर,
लोग तूफ़ान से भी बच के निकल जाते हैं।
हम तुम्हें पाने को ऐसे हैं तड़पते जैसे,
कुछ खिलौने के लिए बच्चे मचल जाते हैं
ये ख़ुनुक शाम ये ज़ुल्फ़ें ये नशीली आँखें
ऐसे 'आलम में नज़ारें भी मचल जाते हैं।
क्यों मुसीबत में निरंजन नहीं रहते अपने ,
हाय! मौसम की तरह यार बदल जाते हैं।
Niranjan Kumar Mahato