वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

नरमी ज़रा नहीं है तुम्हारे स्वभाव में।
हालात फिर बिगाड़ लिये ताव ताव में।

ये ज़िन्दगी की जंग भला कैसे छोड़ दूँ,
कहता है डॉक्टर कि न रहिए तनाव में।

सम्पन्नता का ज़िक्र भी देता है दुख उसे,
जीवन कटा है उसका निरन्तर अभाव में।

संसद की शुद्धि देखिए जारी है अनवरत,
फिर से कई डकैत खड़े हैं चुनाव में।

'अवसर समानता का' छलावा है, दोस्तो,
जनतंत्र दिख रहा है मगन भेदभाव में।

सारे ख़ज़ाने ख़ूब सुरक्षित किए गए,
चोरों की फौज रक्खी गई रखरखाव में।

थी ऐ 'अकेला' मेरी मुहब्बत में कब कमी,
छल की मिलावटें थीं उसी के लगाव में।
वीरेन्द्र खरे 'अकेला'