एक लड़की की आश्नाई में
जी नहीं लग रहा पढ़ाई में
उसकी सोहबत में कैसे समझाऊं
एक पल उम्र है जुदाई में
जान सुन लेती है ख़मोशी भी
तेज़-तर्रार है पढ़ाई में
कर चुके हैं हिसाब-ए-उम्र अपनी
चार कंधों पे चार पाई में
एक दिन हो गए असीर-ए-ज़ब्त
क़ैद यूँ दी गई रिहाई में
सबसे कम है हुजूर सबसे कम
मेरा हिस्सा मेरी कमाई में
चोट लगती है ज़ख़्म लगते हैं
यार किरदार की बुनाई में
आज कुल पाँच है परेशानी
बाँट लेते हैं ढाई-ढाई में
जान सस्ती है इस क़दर सस्ती
ज़हर बेचा गया दवाई में
साँस-दर-साँस बढ़ रही है घुटन
गिर पड़े हैं बदन की खाई में
Nivedan Mishra