Faisal Qadri Gunnauri

कैसे कह दूँ के अजनबी हो तुम?
मुझ को अच्छे से जानती हो तुम

है तुम्हीं से चमन में ये रौनक़
कितने फूलों की ताज़गी हो तुम

साज़-ए-दिल पर तुम्हारा नाम है बस
सोज़-ए-दिल मेरी शायरी हो तुम

है तुम्हारा ख़याल हर लम्हा
दिल की दुनिया पे छा रही हो तुम

हैं तुम्हीं से बहारें गुलशन में
सहन-ए-गुलशन की इक कली हो तुम

मैं तुम्हारा वही तो फ़ैसल हूँ
क्यूँ मुझे ऐसे देखती हो तुम
Faisal Qadri Gunnauri