Danish Balliavi

उसको मैं जब भी पढ़ता हूँ आयात की तरह
आँखों से अश्क गिरते हैं बरसात की तरह

तब्दील हो न पाई मेरी रात जश्न में
गुज़री है मेरी रात सभी रात की तरह

उसके लिए मैं रहता हूँ हर वक़्त मुंतज़िर
मोहलत मुझे वो देता है ख़ैरात की तरह

बंगाल की तरह मैं समझता रहा उसे
अफ़सोस दिल जला दिया गुजरात की तरह

'दानिश' यूँ तेरे शहर में ख़ुशियाँ हैं इसलिए
मय्यत मेरी निकल रही बारात की तरह
Danish Balliavi

Danish Balliavi | We The Sukhanwar