हसीन वादियां छोड़ी यहाँ उतर आए
कहां उतरना था हम को कहाँ उतर आए
वो किस अदा से गुज़र कर गए हैं मुझ पर से
के उनके क़दमों के दिल पर निशाँ उतर आए
ज़रा सी ढील क्या दे दी गुज़िश्ता नबियों ने
ज़रा से वक़्त में इतने बुताँ उतर आए
है तल्ख़ लहजा, अना ,मतलबी ,मेरे मौला
ये कैसे लोग मेरे दरमियाँ उतर आए
है मुख़्तसर सा बयाँ दौर के बदल का हुज़ूर
जो गुज़रे अहल–ए–ज़बां , बदज़बाँ उतर आए
वहीं से चमका ‘इनायत’ नसीब दुनिया का
ज़मीं पे जब शह-ए-कौन-ओ-मकाँ उतर आए
INAYAT ALI CHISHTI